Monday, 10 December 2012

MUKESH SONGS COPIED FROM OTHER SOURCES
SHANKAR JAIKISHAN MUSIC:-
1. Main aashiq hun bahaaron ka (Film: Aashiq)
From the song 'Return to Paradise' (Sanargi'u), from the collection 'Music for an Arabian Night' (1959) by Ron Goodwin.
Listen to Main aashiq hoon (Aashiq) - Return to Paradise (Sanargi'u)
Rahbani Brothers were the composers of the original, 'Sanargi'u'

2. Aa ab laut chalen (Film: Jis desh mein ganga behti hain)
Inspired by the Italian number 'Ciao ciao bambina'. The version added here is by Domenico Modungo which was released in 1959. The Hindi movie came out in 1961.
Listen to Aa ab laut chalen | Ciao ciao bambina

3. Koyi Bulaye Aur Koyi Aaye (Apne Huye Paraye 1964)
Inspired by 'Old Beirut', from the compilation 'Music for an Arabian Night'. Originally titled 'Hala La Laya', composed by Rahbani Brothers.
Listen to Koyi Bulaye | Old Beirut

SALIL CHAUDHARI MUSIC:-
Dil tadap tadap ke (Madhumati 1958)
Inspired by the Polish folk song "Szla dzieweczka do gajeczka" (pronounced "shwah jeh-vehtch-ka duh lah-sech-kah")!
Listen to Dil tadap tadap ke | Szla dzieweczka do gajeczka (slower folk version) | Szla dzieweczka do gajeczka (faster modern version)
I had enquired about this original long back (December 9th, 2001, in RMIM, to be precise!) but couldn't get any info...till now, that is! It was my dad who told me that he had heard the original of this Madhumati number in a documentary titled 'Music and dances of Silesia' that accompanied the Polish World War II classic 'Kanal' by Andrez Wajda (My dad had seen the movie way back in the 60s while he was in Calcutta). So naturally, we both assumed that the original should have Polish origins and have been on the look out ever since. Recently I came across Sundar's website, which also talked about an original to this number. Then finally, with the help of Sundar, I managed to get the original from a Bangalore-based RJ, Seetal Iyer, who hosts the 'Matinee Show' (the FM station is called Radiocity, btw!). Seems her brother had married a girl of Polish descent and it was in their wedding video that she heard the Polish original!
For those who might be interested in knowing more about this Polish number, here goes! I had posted a query about the origins of this number in as many Polish music forums as I could find on the net. And Ms. Wanda Wilk, Director of Polish Music Center at the University of Southern California wrote back with some amazing information, for which I'm really thankful to her. Here's what she says...
"The song is a very popular folk-song that originated in the Silesian (South-Western) part of Poland i.e., from the regions of Slask Gorny (High Silesia), Cieszyn and Opole regions. The ethnographer Juliusz Roger identifies it as coming from Rybnik, which is near the Czech border. That is where the famous Polish jazz pianist, Adam Makowicz, and the famous Polish composer, Henryk Gorecki, come from. It has been very popular throughout Poland for many years, for various celebratory occasions like namesday, youth gatherings etc. It has been recorded by the professional Folk Song & Dance Ensemble, 'Slask' produced by Polskie Nagrania, by the Lira Ensemble of Chicago and by popular singers like Maryla Rodowicz and popular Polish dance bands.
As far as the pronunciation, it goes something like this...
Szla dzieweczka: shwah jeh-vehtch-ka
do laseczka: duh lah-sech-kah
do zielonego: duh zhyeh-loh-neh-go
nadeszla tam mysliweczka: nah-desh-wah tahm mih-shlee-vetch-kah
bardzo szwarnego: bahr-dzoh schwahr-neh-goh
O moj mily mysliweczku: Oh mooy mee-lyh mih-shlee-vetch-koo
dalabym ci chleba z maslem: dah-wah-bim chee hleh-bah z mahs-wem
alem juz zjadla: a-lehm yoosh zyad-wah"

R D BURMAN MUSIC:-
Kahin karti hogi (Film: Phir kab milogi)
Inspired by The Lonely Bull by Herb Albert and Tijuana Brass.
Listen to Kahin karti hogi | The Lonely Bull
Inspired.
MUKESH QAWAALI SONGS:-

For kind attention to everyone mukesh ji sung many qawaalies including, Md. Rafi, Talat mehmood/Lata/ asha bhosle/G.M. durrani etc as co-singers
MUKESH QAWAALI WITH Md.RAFI:-   
1. JALE JALANE WALE HUMKO JAISE -CHILMAN/JANNAT-1949
2. HA SS KHABAR KISI KO NAHI VO-BEQASOOR-1950 (+ G.M.DURANI AND AJEET)
3. MOHABAT KARNE WALO SE KOI  PUCHHE-HANSTE AANSU-1950 (+SHAMSHAD)
4. SUNTE THE SAUQ SE HUM YE-JAANEMAN-1976(+HEMLATA)5.PARDA HAI PARDA,PARDE KE-AMAR AKBAR ANTHONY-1977(+KISHOR KUMAR)

MUKESH QAWAALI WITH KISHOR KUMAR:- 

1.KOI KHUSNASEB NA HOGA HUMSA-MALKIN-1953(+RAM KAMLANI)
2.ARE PHENK DO JAAM..TU KAHTA HAI-KABEELA-1976
3.  DHEKH TUJHE KE DIL SAMBHALA-CHOR MANDALI(+DILRAAJ KOUR)
4.PARDA HAI PARDA,PARDE KE-AMAR AKBAR ANTHONY-1977(+Md. RAFI)
MUKESH QAWAALI WITH G.M. DURRANI:-
1. HA SS KHABAR KISI KO NAHI VO-BEQASOOR-1950 (+Md RAFI AND AJEET)
2. YE AAJ KE LAILA AUR MAJNU-PAGLE-1950-(+JAGIRDAAR,KHAN MASTANA)
3. YE MASTI YE MOUJE YE THANDI-HANSTE AANSU-1950
 

MUKESH QAWAALI WITH TALAT MAHMOOD:-
1. KYUN SIQVA KARE KYUN AAH BHAREN-PAGLE- 1950 (+KHAN MASTANA)
2.KISI KO DEKE DIL KOI - NON FILM -
3. JOSHE GIRINYA SE YE AANKHE- NON FILM
4. VO JO RUTHE TO MANANA CHAHIYE - NON FILM

MUKESH QAWAALI WITH LATA MANGESKER:-
1.RAKHA HU NISHANE PE DIL BHI - HANSTE AANSU - 1950
2.KAHE NAINO MEIN KAJRA BHARO - BADI BAHU - 1951
3.DEKHO JI DEKHO EK BAR IS TARAF-AAS-1953
4.USNE KAHA..MAHNGAI MAAR GAYI -ROTI KAPADA AUR MAKAN 1974 (+
CHANCHAL,JANI BABU KAUWAAL)

MUKESH QAWAALI WITH AASHA BHOSLE:-

1.ITNA HUSNA PE HUZUR NA GURUR MOHABBAT ISKO KAHTEN HAI 1965
2.HUM NE TO KIYA HAI PYAR PYAR-TOOFAN -1969
3.DAAG NA LAG JAAYE KAHIN -MERA NAAM JOKER -1970
4. JARA HUMSE MILO HUM SE MILO-SHER E WATAN-1971

5.YE DIL LEKAR NAJRANA AA GAYA - EK BAAR MUSKARA DO-1972
6. BA ADAB BA...DILRUBA DILLI WALI DUS NUMBARI - 1976(+MANNA DEY)


MUKESH QAWAALI WITH OTHER SINGERS:
VO DIKHLA KE HUMKO POLICE THANA-HANSTE AANSU- 1950
HUMSE KIYA HAI SABNE DIKHAWA-PRIYA-(+AANAND JI)-1970
TERE BINA CHAIN KAHAN BALMA (+ZOHRA BAI)-1950
HUMSE NAIN MILANA B.A.PASS KARKE-ANKHEN(+SHAMSHAD BEGUM)-1950

TOTAL 28 SONGS NOTED, THERE COULD BE SOME MORE SONGS.
IF YOU HAVE ANY OTHER OR EXTRA INFORMATION ABOUT MUKESH SONGS, PLEASE CONTACT ME - pankajmukesh@gmail.com or +91 9342064808 

Sunday, 9 December 2012

पार्श्वगायक मुकेश के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति 

सावन का महीना और मुकेश का अवतरण

हिन्दी फिल्मों में १९४१ से १९७६ तक सक्रिय रहने वाले मशहूर पार्श्वगायक स्वर्गीय मुकेश फिल्म-संगीत-क्षेत्र में अपनी उत्कृष्ठ स्तर की गायकी के लिए हमेशा याद किये जाते रहे हैं। हिन्दी फिल्मों में उन्हें सर्वाधिक ख्याति उनके गाये दर्द भरे नगमों से मिली। इसके अलावा उन्होने कई ऐसे गीत भी गाये हैं, जो राग आधारित गीतों की श्रेणी में आते हैं। २२ जुलाई, २०१२ को मुकेश जी का ८८-वां सालगिरह है। आज उनके जन्मदिवस की पूर्वसंध्या पर रेडियो प्लेबैक इंडिया के नियमित पाठक और मुकेश के अनन्य भक्त पंकज मुकेश, इस विशेष आलेख के माध्यम से मुकेश के गाये गीतों की चर्चा कर रहे हैं। साथ ही आपको सुनवा रहे हैं उनके गाये कुछ सुमधुर गीत। 

 मित्रों, मानसून के आने से ऋतुओं की रानी वर्षा, अपने पूरे चरम पर विराजमान है। दरअसल सावन के महीने और पार्श्वगायक मुकेश के बीच सम्बन्ध बहुत ही गहरा है। मुकेश जी की बहन चाँद रानी के अनुसार २२जुलाई, १९२३ को रविवार का दिन था, धूप खिली थी और मुकेश के जन्म के साथ ही अचानक सावन की रिमझिम बूँदें बरस पड़ीं और पूरा माहौल खुशनुमा हो गया। आइये शुरुआत करते हैं उन्हीं के गाये एक गीत से जो अक्सर घर पर किसी बच्चे के जन्म पर गया जाता है और हर माता-पिता अपने नवजात शिशु से ऐसी ही आशाएं लगाते होंगे जो इस गीत में विद्यमान है। 

ऐ मेरी आँखों के पहले सपने-मुकेश और लता-मन मंदिर 1971

आज पूरे भारतवर्ष में मुकेश को "दर्द भरे गीतों का जादूगर" कहा जाता है मगर राग आधारित गीतों से भी उनका लगाव रहा है। जब किसी एक साक्षात्कार में मुकेश जी से पूछा गया कि- "आप ने यूं तो सैकड़ों गाने गाये हैं मगर आप को किस तरह के गीत सबसे ज्यादा पसंद हैं?" इस पर उनका जवाब था- "अगर मुझे दस लाइट सॉंग (हलके फुल्के गाने) मिले और एक सैड (दर्द भरा गीत) मिले तो मैं दस लाइट छोड़कर एक सैड पसंद करूँगा और अगर मुझे दस सैड गाने मिले और एक क्लासिकल (शास्त्रीय), तो मैं दस सैड छोड़ कर एक क्लासिकल पसंद करूँगा!" तो आइये उन्ही का गाया एक राग आधारित गीत सुनवाते हैं। १९४८ में नौशाद के संगीत निर्देशन की एक फिल्म थी ‘अनोखी अदा’। इस फिल्म में मुकेश ने राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित एक बेहद सुरीला गाना गाया था- ‘कभी दिल दिल से टकराता तो होगा...’। इस राग पर आधारित जो भी स्तरीय गीत अब तक बने हैं, उनमें यह गीत भी शामिल है। फिल्म में मुकेश के गाये इस गीत का एक दूसरा संस्करण भी है, जिसे शमशाद बेगम ने गाया है। कहने की जरूरत नहीं है कि गीत के दोनों संस्करण में दरबारी के सुर स्पष्ट उभर कर आते हैं। 

कभी दिल दिल से टकराता तो होगा-अनोखी अदा राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित

यह भी एक विचित्र संयोग है कि मुकेश ने राग तिलक कामोद पर आधारित लगभग ७-८ गाने गाये हैं और ये सभी गाने बहुत लोकप्रिय हुए है। अब आइये आपको सुनवाते हैं, राग तिलक कामोद पर आधारित उनके प्रारंभिक दौर का एक सुमधुर गीत, जो उनके जीवन का पहला हिट गीत- "दिल जलता है तो जलने दे" (पहली नज़र) के आने से कुछ महीने पहले का है। फ़िल्म 'मूर्ति' का यह गीत राग तिलक कामोद पर आधारित है और इस गीत में उनकी सह-गायिकाएँ है- खुर्शीद और हमीदा बानो। संगीत बुलो सी रानी का है। 

फिल्म ‘मूर्ति’ : "बदरिया बरस गई उस पार..." : राग तिलक कामोद पर आधारित  

दोस्तों, समय सावन के महीने का है और मुकेश जी का जन्म भी इसी महीने में हुआ था, तो क्यूँ न सावन के मौसम पर उनका कोई गीत सुन लें। ऐसे अवसर के लिए सबसे पहला गीत जो हर किसी संगीत-प्रेमी या मुकेश-प्रेमी के मन में आता होगा, वह है फ़िल्म 'मिलन' का गीत "सावन का महीना पवन करे सोर..."। इस गीत के शुरुआत में आपने मुकेश और लता के बीच का संवाद जरूर पसंद किया होगा। कितने आश्चर्य की बात है कि लता जी "शोर" शब्द का सही उच्चारण कर रही हैं, मगर मुकेश हैं कि उन्हें "शोर" के बजाय "सोर" कहने के लिए आग्रह कर रहे हैं। दरअसल फिल्म की कहानी के अनुसार ही ऐसा संवाद रखा गया है, जिसमें नायक गाँव का एक भोला-भाला, अनपढ़ इंसान है जो नायिका को गाने की शिक्षा दे रहा है, और पूरे उत्तर भारत के गाँवों के लोग 'श' को 'स' उच्चारण करते है, जिसको परदे पर और परदे के पीछे बखूबी प्रस्तुत किया गया है। इस गीत से जुड़ी परदे के पीछे की एक और बात मैं आप सब को बताना चाहता हूँ। हमारे साथी राजीव श्रीवास्तव (लेखक, कवि, गीतकार और फिल्मकार) जब संगीतकार-जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के प्यारेलाल जी से पूछा तो पता चला कि जब ये गीत रिकॉर्ड होना था, उसी दौरान मुकेश जी को दिल का दौरा पड़ गया। अस्पताल से उपचार के बाद गाना रिकॉर्ड होना था, सभी तैयारियां हो गई। लता और मुकेश दोनों ने अभ्यास कर लिया। मगर आज हम इस गीत को जिस प्रकार सुनते हैं, शायद उसका प्रारूप ऐसा न होता, अगर मुकेश जी न होते। असल में जब नायक, नायिका को गाने का अभ्यास करा रहा था, उस समय आलाप, नायक को अर्थात्‍ मुकेश जी को लेना था। मगर उनकी बीमारी को ध्यान में रखते हुए संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी में यह हिम्मत नहीं हुई कि आलाप के लिए उनसे आग्रह करें, जो मुकेश के लिए कष्टदायक हो सकता था। मगर मुकेश जी संगीत के प्रति समर्पित जीवट के गायक थे। वो इस बात को भली-भांति जान गए और अभ्यास के दौरान लता से शर्त भी रख ली कि अगर मेरा आलाप उपयुक्त नहीं हुआ तो वो लता को १०० रुपये देंगे, नहीं तो लता देंगी। संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी को इस बात की बिलकुल भनक भी नहीं हुई कि कुछ बदलाव भी होने वाला है। गाना रिकॉर्ड होने से ठीक पहले वायदे के मुताबिक मुकेश जी ने अपने बटुवे से १०० रुपये का एक नोट निकाल कर, लता को चुपके से इशारा करते हुए शर्ट की जेब में डाल लिया। गाना शुरू हुआ, दोनों लोग गाने लगे, पहला अंतरा अपने अनुसार हुआ मगर जैसे ही दूसरा अंतरा पूरा हुआ, मुकेश जी ने आलाप लेना शुरू कर दिया। यह निश्चित किया गया था कि आलाप के स्थान पर वाद्य यंत्रों से भर दिया जाएगा। मुकेश के आलाप करते ही सब चौंक गए, किन्तु रेकार्डिंग जारी रहा। गाने की रेकॉर्डिंग समाप्त होने पर पता चला कि संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल यही चाहते भी थे। राग पहाड़ी पर आधारित यह गीत आप भी सुनिए। 

फिल्म ‘मिलन’ : "सावन का महीना पवन करे सोर..." राग पहाड़ी पर आधारित 

दोस्तों, मुकेश जी को जहाँ हम दर्द भरे गीतों का गायक मानते हैं, वहीँ संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी उन्हें "अपने गीतों का सही गवैया" मानते हैं। जब फिल्म सरस्वती चन्द्र का गीत "चन्दन सा बदन चंचल चितवन..." मुकेश की आवाज़ में रिकॉर्ड होना तय हुआ तो किसी शास्त्रीय गायक ने कल्याणजी से कहा- "हम जैसे सुरों के साधक बसों में धक्के खाते फिरते है और मुकेश एक फिल्मी पार्श्वगायक होकर मर्सिडीज़ में कैसे चलते हैं? उस वक्त तो कल्याणजी चुप रहे, मगर गाना रिकॉर्ड होने के बाद जब उन्हें सुनाया तो बोले "अब समझ में आया मुकेश मर्सिडीज़ में क्यों चलते हैं”? मुकेश बिना किसी ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) के राग आधारित गीत खूब गा लेते थे। दरअसल ये मुकेश जी का शास्त्रीय संगीत के प्रति लगाव ही था जो ऐसे गीत उनके होंठ लगते ही सुसज्जित हो उठते हैं। गायन की जो कुछ भी शिक्षा उन्होंने पायी, वो शुरुआती दिनों (१९४०-१९४५) में पंडित जगन्नाथ जी से मिली। अब आपको जो गीत सुनाया जा रहा है, वह राग कल्याण पर आधारित है।  

फिल्म ‘सरस्वती चन्द्र’ : "चन्दन सा बदन चंचल चितवन..." : राग कल्याण पर आधारित

संगीतकार रोशन और गायक मुकेश न केवल फ़िल्मी दुनिया में एक दूसरे के व्यावसायिक तौर पर मित्र थे अपितु दोनों बचपन में एक ही विद्यालय के सहपाठी भी थे। जब भी कभी कोई विद्यालय में संगीत, नाटक इत्यादि कार्यक्रम का आयोजन होता, दोनों लोग ज़रूर शरीक होते। जहाँ मुकेश गीत गाते वहीँ रोशन संगीत की बागडोर सँभालते, उनका बखूबी साथ निभाते थे। तो आइये क्यूँ न एक बहुत ही लोकप्रिय गीत सुना जाये जो इन दो कलाकारों द्वारा सृजित किया गया है। इस गीत के बनने का किस्सा बड़ा ही दिलचस्प है। इन्दीवर के लिखे इस गीत के लिए रोशन ने कुछ धुन तैयार की थी मगर उन्हें कुछ पसंद नहीं आ रहा था। यूँ लगता था मानो कुछ कमी है, कुछ नया होना चाहिए जो उस समय के माझी, नाव, नदी आदि गीतों की धुनों से अलग हो। करीब पूरा महीना बीत गया मगर कुछ बात नहीं बनी। ऐसे में अचानक एक दिन रोशन, मुकेश और इन्दीवर के साथ अपना हारमोनियम लेकर कार से सैर पर निकले। एक जगह तालाब दिखा तो बैठ कर कुछ क्षण बिताने का मन हुआ। रोशन ने जैसे ही अपना पांव तालाब के शीतल जल में डाला, अचानक दोनों साथियों से बोल पड़े- "धुन बन रही है", जल्दी से कार से हारमोनियम लाये और वहीँ बैठे तीनों ने मिल कर गीत के संगीत की रचना कर डाली। अगले ही दिन स्टूडियो में जाकर यह गीत रिकॉर्ड हो गया। यह गीत लोक-धुन की सोंधी खुशबू से सराबोर है। 

फिल्म ‘अनोखी रात’ : “ओह रे ताल मिले नदी के जल में..." : लोक संगीत पर आधारित  

 मुकेश के गाये गीतों में राग-आधारित अनेक गीत लोकप्रिय हुए। इन गीतों में राग भैरवी और तिलक कामोद के स्वरों में गाये गीतों की संख्या अधिक हैं। ये दोनों राग उनकी आवाज़ में बहुत अच्छे भी लगते हैं। अब चलते-चलते राग भैरवी के सुरों पर आधारित एक प्यारा सा गीत आपको सुनाते हैं। यह गीत 1966 की फिल्म तीसरी कसम का है, जिसे मुकेश ने अपना स्वर दिया था। बीच-बीच में राज कपूर की आवाज भी है। इस गीत में लोक संगीत का स्पर्श है और भैरवी के स्वर भी मौजूद हैं। 

फिल्म ‘तीसरी कसम’ : “दुनिया बनाने वाले..." : राग भैरवी पर आधारित

शोध व आलेख- पंकज मुकेश 

आभार- कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, 8 December 2012

http://www.facebook.com/groups/singermukesh/
http://www.facebook.com/groups/singermukesh/





22 july 1923 to 27 august 1976 (6:30 pm GST- IST 3:40pm 28 august 1976)

"छलिया मेरा नाम..." - इस गीत पर भी चली थी सेन्सर बोर्ड की कैंची 

सेन्सर बोर्ड की कैंची की धार आज कम ज़रूर हो गई है पर एक ज़माना था जब केवल फ़िल्मी दृश्यों पर ही नहीं बल्कि फ़िल्मी गीतों पर भी कैंची चलती थी। किसी गीत के ज़रिये समाज को कोई ग़लत संदेश न चला जाए, इस तरफ़ पूरा ध्यान रखा जाता था। चोरी, छल-कपट जैसे अनैतिक कार्यों को बढ़ावा देने वाले बोलों पर प्रतिबंध लगता था। फ़िल्म 'छलिया' के शीर्षक गीत के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। गायक मुकेश के अनन्य भक्त पंकज मुकेश के सहयोग से आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' की १६-वीं कड़ी में इसी गीत की चर्चा...  

 

सम्प्रति "कैरेक्टर ढीला है", "भाग डी के बोस" और "बिट्टू सबकी लेगा" जैसे गीतों को सुन कर ऐसा लग रहा है जैसे सेन्सर बोर्ड ने अपनी आँखों के साथ-साथ अपने कानों पर भी ताला लगा लिया है। यह सच है कि समाज बदल चुका है, ५० साल पहले जिस बात को बुरा माना जाता था, आज वह ग्रहणयोग्य है, फिर भी सेन्सर बोर्ड के नरम रुख़ की वजह से आज न केवल हम अपने परिवार जनों के साथ बैठकर कोई फ़िल्म नहीं देख सकते, बल्कि अब तो आलम ऐसा है कि रेडियो पर फ़िल्मी गानें सुनने में भी शर्म महसूस होने लगी है। मुझे याद है "चोली के पीछे क्या है" और "कभी मेरे साथ कोई रात गुज़ार" गीतों के आने पर भी कुछ लोगों ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई गई थी, पर सेन्सर बोर्ड के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। ख़ैर, अब चलते हैं पुराने ज़माने में। ५० के दशक में गीता दत्त के गाए फ़िल्म 'आर-पार' के गीत "जाता कहाँ है दीवाने सबकुछ यहाँ है सनम, कुछ तेरे दिल में फ़ीफ़ी, कुछ तेरे दिल में फ़ीफ़ी" को फ़िल्म से हटवा दिया गया था, ऐसा कहा जाता है कि सेन्सर बोर्ड को "फ़ीफ़ी" शब्द से आपत्ति थी क्योंकि इसका अर्थ स्पष्ट नहीं था। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि हम कहाँ से आज कहाँ आ पहुँचे हैं।
राज कपूर - नूतन अभिनीत फ़िल्म 'छलिया' १९६० की सुभाष देसाई निर्मित व मनमोहन देसाई निर्देशित फ़िल्म थी। इस फ़िल्म का शीर्षक गीत "छलिया मेरा नाम, छलिया मेरा नाम, हिन्दू मुसलिम सिख इसाई सबको मेरा सलाम" फ़िल्म-संगीत का एक सदाबहार नग़मा रहा है। कल्याणजी-आनन्दजी द्वारा स्वरबद्ध एवं क़मर जलालाबादी का लिखा यह गीत वास्तव में ऐसा नहीं लिखा गया था। इस गीत का मूल मुखड़ा था "छलिया मेरा नाम, छलना मेरा काम, हिन्दू मुसलिम सिख इसाई सबको मेरा सलाम"। अब सेन्सर बोर्ड को "छलना मेरा काम" में आपत्ति थी। बोर्ड के अनुसार यह ग़लत संदेश था समाज के लिए, युवा-पीढ़ी के लिए, और वह भी फ़िल्म के नायक की ज़ुबां से। इसलिए "छलना मेरा काम" की जगह "छलिया मेरा नाम" की पुनरोक्ति कर दी गई। यही नहीं गीत के अंतरों में भी फेर बदल किया गया है। सच तो यह है कि इस गीत के कुल तीन वर्ज़न बने थे। जो वर्ज़न ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर जारी हुआ और जो हमें सुनाई देता है, उसके बोल ये रहे:
छलिया मेरा नाम, छलिया मेरा नाम - २
हिंदू मुसलिम सिख इसाई सबको मेरा सलाम
छलिया मेरा नाम...
देखो लोगों ज़रा तो सोचो बनी कहानी कैसे?
कहीं पे ख़ुशियाँ कहीं पे ग़म है, क्यूं होता है ऐसे-२
वाह रे तेरे काम, कहीं सुबह से शाम
हिंदू मुसलिम....
रोक रहे हैं राहें मेरी नैना तीखे-तीखे,
हम तो ख़ाली बात के रसिया इश्क़ नहीं हम सीखे
जहाँ भी देखा काम, करता वहीं सलाम
हिंदू मुसलिम...
मैं हूँ ग़रीबों का शहज़ादा जो माँगू वो दे दूँ
शहज़ादे तलवार से खेलें मैं अश्क़ों से खेलूँ
मेहनत मेरा काम, देना उसका काम
हिंदू मुसलिम...
पंकज मुकेश के सौजन्य से इस गीत के मूल संस्करण का पता चल पाया है। ये रहा वह संस्करण...
छलिया मेरा नाम, छलना मेरा काम - २
हिंदू मुसलिम सिख इसाई सबको मेरा सलाम
छलिया मेरा नाम...
देखो लोगों ज़रा तो सोचो बनी कहानी कैसे?
तुमने मेरी रोटी छीनी, छीनी मैंने पैसे
सीखा तुम से काम, हुआ मैं बदनाम
हिंदू मुसलिम....
रोक रही हैं राहें मेरी नैना तीखे-तीखे
हम तो ख़ाली माल के रसिया इश्क़ नहीं हम सीखे
जहाँ भी देखा दाम, वहीं निकाला काम
हिंदू मुसलिम...
मैं हूँ गलियों का शहज़ादा जो चाहूँ वो ले लूँ
शहज़ादे तलवार से खेलें मैं कैंची से खेलूँ
मेहनत मेरा काम देना उसका काम
हिंदू मुसलिम...
उपर्युक्त संस्करण के पहले अंतरे को हटाकर कर भी गीत का एक और संसकरण कुछ ऐसा बना था...
छलिया मेरा नाम, छलना मेरा काम - २
हिंदू मुसलिम सिख इसाई सबको मेरा सलाम
छलिया मेरा नाम...
रोक रही हैं राहें मेरी नैना तीखे-तीखे
हम तो ख़ाली माल के रसिया इश्क़ नहीं हम सीखे
जहाँ भी देखा दाम, वहीं निकाला काम
हिंदू मुसलिम...
मैं हूँ गलियों का शहज़ादा जो चाहूँ वो ले लूँ
शहज़ादे तलवार से खेलें मैं कैंची से खेलूँ
मेहनत मेरा काम देना उसका काम
हिंदू मुसलिम...
इस तरह से हम देखते हैं जहाँ-जहाँ असामाजिक व अनैतिक कार्यों की बात की गई थी, उन्हें बदल दिया गया और जो गीत बाहर आया वह एक निहायती ख़ूबसूरत संस्करण था। इसके लिए पूरा श्रेय जाता है क़मर जलालाबादी साहब को। अब 'छलिया' से जुड़ी कुछ और रोचक बातें। राज कपूर अभिनीत फ़िल्मों में अधिकतर शंकर-जयकिशन का संगीत हुआ करता था। इस फ़िल्म के संगीतकार कल्याणजी-आननदजी ज़रूर थे पर गीतों के कम्पोज़िशन में शंकर-जयकिशन का स्टाइल साफ़ झलकता है। संगीतकार का चुनाव निर्माता-निर्देशक की पसन्द थी। विविध भारती के 'जयमाला' में कमर जलालाबादी ने व्यंग करते हुए कहा था, "डिरेक्टर मनमोहन देसाई की पहली फ़िल्म 'छलिया' अपने भाई सुभाष देसाई के लिए डिरेक्ट किया। सुभाष देसाई ने संगीतकार के लिए कल्याणजी-आनन्दजी का नाम चुना। सुभाष देसाई का नाम सुनते ही कल्याणजी भाग खड़े हुए। सुभाष देसाई ने उनका पीछा नहीं छोड़ा, उन्हें पकड़ कर उन्हें संगीतकार बनाकर ही दम लिया।" क़मर साहब ने यह क्यों कहा कि सुभाष देसाई का नाम सुनते ही कल्याणजी भाई भाग खड़े हुए, यह तो पता नहीं चल पाया, पर यह बात ज़रूर है कि देसाई भाइयों का गीतों पर दखलंदाज़ी रहती थी। फ़िल्म 'छलिया' में राज कपूर पर फ़िल्माये सभी गीत मुकेश के गाए हुए थे सिवाय एक गीत "गली गली सीता रोये आज मेरे देस में" के जिसे रफ़ी साहब से गवाया गया था। जब पंकज मुकेश ने आनन्दजी से यह पूछा कि क्या कारण था कि राज कपूर पर फ़िल्माये गए इस गीत को मुकेश से नहीं गवाया गया, तो आनन्दजी बोले कि कई बार प्रोड्युसर-डिरेक्टर की माँग को भी पूरा करना पड़ता है। और यह तो हम सभी जानते हैं कि मनमोहन देसाई रफ़ी साहब के बहुत बड़े फ़ैन थे। इस तरह से यह एक गीत रफ़ी साहब से न केवल गवाया गया बल्कि फ़िल्म के अन्त में साधारणत: फ़िल्म के शीर्षक गीत को बजाया जाता है जबकि इस फ़िल्म में रफ़ी साहब के गाए इस गीत को बजाया गया।
ख़ैर, आज का मुद्दा था फ़िल्मी गीतों के सेन्सरशिप का। 'छलिया' १९६० की बात थी, पर ७० के दशक के आते-आते सेन्सर बोर्ड ने सख़्ती कुछ कम कर दी। इसका उदाहरण है १९७५ की फ़िल्म 'चोरी मेरा काम' का शीर्षक गीत "कौन यहाँ पर चोर नहीं है सबका है यही काम, वो करते हैं चोरी चोरी, करूँ मैं खुल्ले आम, चोरी मेरा काम यारों"। रोचक बात यह है कि इस गीत के संगीतकार एक बार फिर कल्याणजी-आनन्दजी हैं। १९७२ की फ़िल्म 'बेइमान' के शीर्षक गीत में भी बेइमान की जयजयकार होती सुनाई दी है, और इसमें मुकेश की आवाज़ थी। और मज़ेदार बात इस फ़िल्म के लिए शंकर-जयकिशन को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी दिया गया था। तो बात बस इतनी है कि समाज के बदलने के साथ-साथ, सामाजिक मूल्यों के बदलने के साथ-साथ, फ़िल्म सेन्सरशिप में भी बदलाव आए हैं, लेकिन जैसा शुरू में मैंने कहा था, उसी बात पे ज़ोर दे रहा हूँ कि कल कहीं ऐसा न हो कि फ़िल्मी गीत सुनने के लिए भी बड़े-बुज़ुर्गों से दूर अन्य अलग कमरे में जा कर बैठना पड़े।
आभार :- सुजॉय चटर्जी

 

अंजू पंकज की दिव्य प्रेरणा "जय संतोषी माँ" मैंने देखी पहली फिल्म

फिल्म देख कर सन्तोषी माँ का व्रत करने की इच्छा हुई : अंजू पंकज

मैंने अपने जीवन में सबसे पहली फिल्म देखी -"जय सन्तोषी माँ"। इस फिल्म के बारे में हर एक बात मैं आज तक भूल नहीं पायी। सच में पहली फिल्म कुछ ज्यादा ही यादगार होती है। बात उस समय की हैं जब मैं पाँचवीं कक्षा में पढ़ती थी, महज दस साल कि उम्र थी। दुनियादारी से कहीं दूर एक बच्ची के मन में जो कुछ आता था, उनमें कहीं न कहीं चम्पक, नन्हें सम्राट, चाचा चौधरी, नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, इत्यादि बच्चों की किताबों का असर जरूर होता था। यह फिल्म मैंने अपने पापा-मम्मी और नानी के साथ आगरा के "अंजना टाकीज" में 3 से 6 बजे वाला दूसरा शो देखा था। फिल्म को देखने के बाद मेरे बाल-मन पर जो पहला असर हुआ वो यही था कि सच्चाई की हमेशा जीत होती है, हमें एक अच्छा इन्सान बनाना चाहिए, दैवी शक्तियाँ (सन्तोषी माँ) सबके भले-बुरे कर्म देखती हैं और अन्त में उनके कर्म के अनुसार अच्छा और बुरा फल मिलता है। कितने दुःख की बात है कि एक ही परिवार में जेठानियाँ अपनी ही देवरानी से साथ दण्डनीय बर्ताव करती हैं, तरह-तरह की यातनाएँ उसे सहनी पड़ती है। उसका पति जब काम की तलाश में शहर चला जाता है तो घर के लोग देवरानी को सबका बचा खाना (जूठन) देती हैं खाने को। यह सब फिल्म में देख कर मेरा दिल भर आया था। मन करता था कि अगर मैं घर में होती तो सबको कड़ी से कड़ी सजा देती। तभी कुछ देर में माँ सन्तोषी आती हैं और सारी परेशानी दूर कर देती हैं। मगर उन जेठानियों की हर बार कुछ नई हरकतें सामने आती, और सन्तोषी माँ बार-बार उसकी मदद करतीं। सबसे पहली बार जब ये सब दृश्य देखा था तो बस मेरी स्थिति बिलकुल रोने जैसी हो गई थी। मुझे पता नहीं था की कोई दैवी शक्ति भी बचाने आएगा/आएँगी। मगर जब एक बार सन्तोषी माँ को प्रकट होते और सारी परेशानी दूर करते देखा तो हर अगले दृश्य में मैं मन ही मन आवाज़ लगाती कि ‘सन्तोषी माँ, जल्दी आओ, कहाँ हो, देर मत करो’। फिल्म समाप्त होने पर जब सिनेमाघर की सारी लाइट जली तो मैं जल्दी से नानी से जा लिपटी। लौटते वक़्त रास्ते में मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे कि लोग ऐसा क्यों करते हैं, ऐसा नहीं करना चाहिए, ये अच्छी बात नहीं। बहुत रोका खुद को मगर मैंने पापा से पूछ ही लिया की पापा उन लोगों (जेठानियों) ने ऐसा क्यों किया? ये सब गलत बात है, वो लोग इतनी बड़ी होकर छोटी (देवरानी) को परेशान करते थे, ऐसा नहीं किया होता तो वो भी खुश रहते। पापा ने कहा ये सब कहानी होती है, जैसा तुम किताबों में पढ़ती हो, इस बार तुमने चलती-फिरती तसवीरों के रूप में देखा है, बस इतना ही अन्तर है। पापा के जवाब ने थोड़ी देर के लिए मुझे शान्त तो किया, मगर मन को पूरी तरह सन्तुष्टि नहीं मिली। फिर मेरे मन में ख़याल आता कि पापा ने मुझे छोटी बच्ची समझ कर बहला दिया है। सच वही है जो मैं सोच रही हूँ। 

इस फिल्म के सभी गाने मुझे अच्छे लगे। परन्तु- "यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछो कहाँ कहाँ..." और "मैं तो आरती उतारूँ रे सन्तोषी माता की, जय जय सन्तोषी माता जय जय माँ..." मुझे आज भी बेहद पसन्द है। इस फिल्म को देखने और इसके गाने सुनने के बाद मेरी आस्था और श्रद्धा सन्तोषी माँ के बढ़ गई थी। मेरा भी मन करता था की मैं भी शुक्रवार का व्रत रखूँ। आज जब इस फिल्म के बारे मैं पढ़ती हूँ अखबारों में, इन्टरनेट पर तो मन ही मन अपने बचपन को याद करती हूँ। आज भले ही मैं इसे अपना बचपना समझ कर टाल जाऊँ, परन्तु सच तो यही है कि उन दिनों न जाने कितनी महिलाओं ने इस फिल्म को देखने के बाद सोलह शुक्रवार का व्रत रखना शुरू कर दिया था। 

1975 में प्रदर्शित फिल्म ‘जय सन्तोषी माँ’ बॉक्स आफिस पर अत्यन्त सफल धार्मिक फिल्म थी। इस फिल्म का दो गीत, जो अंजू जी को सर्वाधिक पसन्द है, उन्हें हम आपको भी सुनवाते है। इन गीतों के संगीतकार सी. अर्जुन और गीतकार प्रदीप हैं। 

फिल्म – जय सन्तोषी माँ : ‘मैं तो आरती उतारूँ रे...’ : ऊषा मंगेशकर और साथी 

https://www.youtube.com/watch?v=0TQcoopaUcE 


 आभार :-कृष्णमोहन  मिश्र  जी !!!


मैंने देखी पहली फिल्म-‘मैं ना भूलूँगा...’-हमसे है मुक़ाबला’
मेरे जीवन की पहली फिल्म, जो सिनेमाघर में देखी, वो है- ‘हमसे है मुक़ाबला’। प्रभुदेवा और नगमा अभिनीत इस फिल्म में ए.आर. रहमान का संगीत था। रहमान हिन्दी फिल्मी दुनिया में उस समय नये-नये आए थे, अपनी 2-3 सफल फिल्मों (रोजा, बाम्बे आदि) के बाद। संगीत के साथ-साथ प्रभुदेवा का डांस वाकई कमाल का था। हिन्दी डबिंग के गीतकार पी.के. मिश्रा के गाने भी बहुत मक़बूल हुए थे। ये फिल्म मैंने अपने स्कूल के 2-4 दोस्तों के साथ बिना किसी इच्छा के, देखने गया था। बात उस समय की है जब यह फिल्म पहली बार परदे पर प्रदर्शित हुई और अपने शहर बनारस (वाराणसी) में लगी थी। टेलीविजन पर लगभग हर फिल्मों से सम्बन्धित कार्यक्रम जैसे-चित्रहार, countdaown शो इत्यादि में ‘हमसे है मुकाबला’ के गीत खूब प्रसारित होते थे। यह सब देख कर मन तो जरूर करता था की फिल्म देखी जाए, मगर सिनेमाघर में जा कर फिल्म देखना मेरे जैसे दसवीं कक्षा का विद्यार्थी होने तथा एक अध्यापक का पुत्र होने के नाते खुद को रोकना भी पड़ता था। कारण, कहीं पापा को बुरा न लगे। उस समय बच्चों का फ़िल्में देखना अच्छा नहीं माना जाता था और आज भी यही होता है।

२-३ महीनों बात एक अवसर मिला। वह १४अगस्त का दिन था। अगले दिन स्वतंत्रता दिवस के कारण जल्दी छुट्टी होनी थी। उस दिन हम सभी छात्र स्कूल जाते, कुछ कार्यक्रम होते, कुछ में भाग लेते, तिरंगा फहराते और फिर छुट्टी। मेरे कुछ सहपाठी लोग फिल्म देखने की योजना बना रहे थे। तभी किसी ने मुझसे पूछा- ‘क्या तुम हमारे साथ फिल्म देखने चलोगे’? मेरे लिए एक असमंजस की बात थी। आज तक कभी गया नहीं, मगर सुझाव बुरा भी नहीं था, फिर भी कहा- ‘पापा से पूछ कर बताऊंगा’। दोस्तों ने कहा- ‘ठीक है अगर चलना हो तो सारे कार्यक्रम के बाद हमारे साथ चलना, १२ से ३ वाला शो देखेंगे’। पूरा दिन बीत गया कि कैसे पापा से अनुमति मांगूं, फिल्म देखने की? क्या सोचेंगे? बच्चा कहीं बिगड़ तो नहीं रहा, कोई देशभक्ति फिल्म भी तो नहीं लगी है इस समय, जो अनुमति मांगने में मेरी मदद करे। कैसे कहूँ? फिर मैंने सोचा, कल ही तुरंत स्कूल में सारे कार्यक्रम समाप्त होते ही पापा को बता दूंगा। अगर हाँ कहेंगे, तो जाऊंगा। पापा मेरे उसी स्कूल में अध्यापक भी थे, तो कोई परेशानी भी नहीं हुई। जब पापा से कहा तो बोले- ‘कैसे जाओगे? मैंने सब कुछ सही सही बता दिया और पापा ने कहा- ‘जाओ मगर संभल कर जाना, और साथ में कुछ पैसे भी दिए। शायद पापा को लगा होगा कि बेटा कभी फिल्म देखने नहीं गया और आज पहली बार अनुरोध किया तो मना करना ठीक नहीं होगा। मैं बहुत खुश हुआ था। हम सभी लोग अपनी अपनी साइकल से अपने स्कूल के ड्रेस- सफ़ेद रंग के शर्ट, पैंट, पी.टी.शू वाले सफ़ेद जूते मोज़े और शर्ट की जेब पर लगे प्लास्टिक के एक तिरंगे प्रतीक समेत सिनेमाघर की ओर चल पड़े। १०:३० बजे स्कूल से रवाना हुए और बीच में इधर उधर घूमते-रुकते ११:३० बजे मलदहिया स्थित आनंद मंदिर सिनेमाघर। उन दिनों टिकट-दर ८, १०, और बालकनी का १२ रुपये हुआ करता था।  


फिल्म शुरु होने से पहले हम सभी के मन में दो बातें उत्सुकतावश घर कर गई थी। पहली, ये कि फिल्म "हम से है मुकाबला" एक तमिल फिल्म "कादलन" का हिंदी रूपांतरण था, इस तरह से हिंदी में संवाद रूपान्तरण के कारण सभी पात्रों के होंठों के हिलने में अंतर मिलेगा, क्योंकि संवाद मूलतः तमिल भाषा में थे और अगर हिंदी में सभी संवाद बनाये गए होंगे तो किस तरह से तमिलभाषी लोग हिंदी बोल पा रहे हैं। दूसरी बात यह थी की इस फिल्म के दो गीत "उर्वशी उर्वशी..." तथा "मुक्काला मुकाबला होगा..." में प्रभुदेवा की नृत्य गति बहुत तेज़ थी और ऐसा हम लोग सोचते थे कि पहले इन दोनों गानों का पूरा डांस देखेंगे फिर सोचेंगे की ऐसा डांस हमारे हिंदी फिल्मों के कलाकार गोविंदा कर पायेंगे या नहीं, क्योंकि टेलीविजन पर केवल बेस्ट सीन ही दिखाते। फिल्म पूरी देखने के बाद यकीन हुआ कि प्रभुदेवा का "फास्ट डांस" में कोई मुकाबला नहीं कर सकता।
पंकज मुकेश की देखी पहली फिल्म ‘हमसे है मुक़ाबला’ से एक बेहद लोकप्रिय गीत- "उर्वशी ..." 
https://www.youtube.com/watch?v=KxFcqi6ttAohttps://www.youtube.com/watch?v=p-bXhJFNI00

 आभार :-कृष्णमोहन  मिश्र  जी !!!